सवाल करते रहो

कुछ साल पहलेशायद इमर्जेंसी के समयमेरे पापा कुछ १५ साल के रहे होंगेतब उनके एक दोस्त ने उन्हें एक कविता पढ़ने को दीओम प्रकाश वाल्मीकि कीमगर जैसे ही दादा ने देखा उन्होंने वह फट से छीन लीऔर कूड़े में फेंक दीऔर कहा यह सब मत पढ़ा करचल रामायण पढ़उसमें भी तो राम शबरी के झूठेContinue reading “सवाल करते रहो”