भगवान और दादा

जब रात अच्छी होती है,तो दादाजी भगवान के कमरे में सोते हैंजब रात बुरी होती हैतो भगवान जी दादा के कमरे में सोते हैंमैं दोनों के बीच में सोता हूंकभी भगवान की तरफ़ वाली खिड़कीप्रकृति के सुहावने गीत गुनगुनाती हैकभी दादा की तरफ़ वाली खिड़कीबुढ़ापे की गाथा कराहती है।

देश कागज पर बना नक्शा नहीं होता

यदि तुम्हारे घर केएक कमरे में आग लगी होतो क्या तुमदूसरे कमरे में सो सकते हो?यदि तुम्हारे घर के एक कमरे मेंलाशें सड़ रहीं होंतो क्या तुमदूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो?यदि हाँतो मुझे तुम सेकुछ नहीं कहना है। देश कागज पर बनानक्शा नहीं होताकि एक हिस्से के फट जाने परबाकी हिस्से उसी तरहContinue reading “देश कागज पर बना नक्शा नहीं होता”

ज़िम्मेदारी

कभी कभी किसी भी कारण वश हम गलत ज़िम्मेदारी उठाने लगते हैं,जैसे हम ना जाने कितनी बारमौत को अपने पास लाने की ज़िम्मेदारीखुद लेने लगते हैंऔर जो हमारी असली ज़िम्मेदारी हैज़िन्दगी जीते रहने कीउससे भटक जाते हैंमौत तो हमारे पास चलकर आ जायेगीथोड़ा ज़िंदगी के पास भी जाकर देखेंअच्छा लगेगा।

फैमिली फोटो

रिश्तों को टिका कर रखने के लिएदिल की दीवार सेईगो की सीलन को हटाना पड़ता हैऔर कॉम्प्रोमाइज की कील ठोककरफैमिली फोटो लगाना पड़ता है।

तुम्हारा गुस्सा तुम्हें कहां ले जाता है?

क्या तुम्हारा गुस्सा किसी के टाइमलाइन पर जाकर गाली देने के बाद तुम्हें छोड़ देता है?या वो सचमुच मदद करता है गलत के खिलाफ आवाज उठाने को । क्या वो तुम्हें खुदको शिकार और सामने वाले को शिकारी बोलने के लिए भड़काता है?या वो दोनों को इंसान की तरह देखने में मदद करता है। क्याContinue reading “तुम्हारा गुस्सा तुम्हें कहां ले जाता है?”

मैं हूं थाली

मैं हूं थाली,पिछले कुछ महीनों में,सबसे गरीब लोगों के घर मेंमैं ज़्यादा ही खाली होती गईऔर सबसे अमीर लोगों के घर मेंज़रूरत से ज़्यादा भरती गईमिडल क्लास मुझेबजाते रहेऔर नेता उनकी थाली में डोनेशनके नाम पर छेद करकेअपने लिए नए महलबनाते गएमैं हूं थाली।

बीच की दुनिया

हम दोनों के बीच एक दुनिया है,यह दुनिया ऐसी ही चलती रहेगुस्सा ना हो जाएइसलिए हमने दूर होने का सोचापर जैसे ही पहले से दूर हुए तोइस दुनिया ने हमारा दर्द भी समेट लियाशायद पास आते तो ज़्यादा प्यार समेट लेतीजो दुनिया के गुस्से से लड़ने में मदद करता।

दुष्चक्र

आंखें बोली आंसू से तुम क्यों थम गए भाईउम्र बड़ी तो क्या हुआ अब भी जारी है दिलो दिमाग की लड़ाई… आंसू बोला दिल से पूछो उसने कितनी बातें छुपाईदिल ने दिमाग को दोषी ठहराया, कहा उसने दी थीसमझदारी की दुहाई ।

बॉम्ब स्क्वाड का कुत्ता

एक बार बॉम्ब स्क्वाड के कुत्ते से मैंने पूछातुम्हें बारूद ढूंढते हुएइब्राहीम के इत्र की खुशबू अायीया शिव के धतूरे कीवह गुराया…मैं पीछे हटाउसने गुस्से में जवाब दियामुझे तो बसउन दोनों के बीचनफ़रत फैलाने वालेकी बदबू अायी।

सपनों के बीज

हम सब अपने सपनों को बोते हैंपर सबकी ज़मीन एक सी नहीं होतीसबको एक सी धूप नहीं मिलतीकांटे सबके हिस्से आते हैंपर सबको माली की मदद नहीं मिलती अकेले रहकर भी जो ठान ले तोकांटों में भी गुलाब उगादेसाथ मिलने पर भी जो भटके तोसूरजमुखी की भी चमक लुटा दे लहलहाकर खुदकभी जो सहरा देContinue reading “सपनों के बीज”

नशे में धूत

जब हम लाखों टन अनाज को सड़ते देख कुछ नहीं कहते,जब उस लाखों टन सड़े अनाज को शराब में घुलते देख कुछ नहीं कहते,तो हम सब बिना पिये नशे में धूत हैंऔर नशे में धूत लोगों को अपनी लाचारी नहीं दिखतीदूसरों की लाचारी की बात तो छोड़ ही दीजिए…

सच

सचसच के मायने बदल गए हैंहम बस दो सच ही समझते हैंपहले ही माना हुआ सचदूसरों को झूठलाता सचहमने अपने मन के एक तरफ कालीऔर एक तरफ सफेद स्याही पोत ली हैफिल्म में, टीवी में, इंटरनेट परसब जगह हमअपने माने हुए सच कोऔर सच बनाने केतरीक़े खोज रहे हैंताकि दूसरों की नज़रों मेंजब खुद कोContinue reading “सच”

जुमला और हमला

चुनावी मौसम में नेताजी ने लगाया“बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ”का नाराबेटी पढ़ीआगे बढ़ीउनकी गलतियों के ख़िलाफबेटी की आवाज़ उठीतो जवाब मेंनेताजी बोलेबेटी वो नारा नहीं थाथा एक जुमला…हमसे सवाल करोगीतो हो जाएगातुम्हारी आज़ादी पर हमला On Friday, Natasha Narwal joined the list of students of falsely accused with UAPA for protesting against CAA & NRC andContinue reading “जुमला और हमला”

यह कैसा समय है? (हिन्दी अनुवाद)

Original – What Kind Of Times Are These? By Adrienne Rich नोट: यह शब्दशः अनुवाद नहीं है, रूह को पकड़ने की कोशिश है । यहां से कुछ दूर पर एक जगह है, जहां दो रास्ते मिलते हैं,एक रास्ते पर दो काफ़ी लंबे पेड़ों के बीच हरी घांस अब भी उग रही हैऔर दूसरे रास्ते परContinue reading “यह कैसा समय है? (हिन्दी अनुवाद)”

स्थिरता और बदलाव

मेरे दादा को बदलाव पसंद नहींउन्होंने शायाद इतने उतार चढ़ाव देखें हैंकी वो हर चीज़ में एक स्थिरता खोजते हैंमेरी मां को स्थिरता से ऊब जाती हैंउन्होंने अपने शुरू के जीवन में ऐसा अभाव देखा हैजिसे बदलाव से ही पूरा किया जा सकता थाइस रोज़मर्रा के द्वंद्व के बीच एक आदमी खड़ा हैजिन्हें मैं पापाContinue reading “स्थिरता और बदलाव”

रोटी, कपड़ा और मकान

सड़क पर निकले तोदवाई छिड़क दी,रेल की खिड़की मेंनंगे बदन से भी पैसा मांग लियाट्रेन शुरू हुई तो बिल्डर्स के साथ मीटिंग करकेमजदूरों को कैद कर लिया गयाउनके जाने पर रोक लगा दीक्या ताकतवर अपनी बची कुची शर्मडोलोगाना कॉफी में मिला कर पी गएउनका क्या कसूर हैयही की वह हमारे घर बनाते हैंहमारे लिए अनाजContinue reading “रोटी, कपड़ा और मकान”

सपनों का किनारा

सपनों के किनारे पे बैठे थे तीन यारएक के लिए बाप दादा का बड़ा जहाज आयाऔर वो विदेश निकल लियादूसरे के लिए एक नाव अाईजिसे उसके मां और पिता नेबड़ी मेहनत से बनाया थादूसरा उसमें बैठा और बड़े शहरनिकल लियातीसरे ने इंतजार कियासोचा कोई तो आएगाकोई आया तो सहीपर उसे धक्का देकर चला गयाथोड़ी देरContinue reading “सपनों का किनारा”

जान और संसद

एक आदमीजान से मर रहा हैएक आदमी जान बचा रहा हैएक तीसरा आदमी भी हैजो ना जान बचाता है, ना कोशिश करता हैवह सिर्फ़ दूसरों की जान से खेलता हैमैं पूछता हूँ–‘यह तीसरा आदमी कौन है ?’मेरे देश की संसद मौन है। धूमिल की कविता रोटी और संसद से प्रेरित

राम रामलाल

वह चला था चौदह बरस तकअब उसे तुम चार दिवारी में बंद करउसके नाम पे लड़ कर धंधा खोलना चाहते होऔर उसे धर्म बताते होजब कर रहे हो उसका १००८ बार गुणगान टीवी के सामनेकोई रामलाल पैदल ही जा रहा है १००८ किलोमीटर अपने परिवार के पासतुम पूछते हो मैं तो घर में बैठकर क्याContinue reading “राम रामलाल”

Pehla Lesson- Insaaniyaat

Use farak nahi padta aapki inn dharm ke naam par hui ladaiyon se,Wo toh roz bhook se ladta hai,Usse Right Wing – Left Wing se bhi koi matlab nahi,Wo toh apne pankh doondh raha hai,Ab agar iss chai ki channi ko hatakar,Usse koi kitaab thama de,Kitaab jismein Insaaniyat ho pehla lesson,Toh usse apne pankh mehsoosContinue reading “Pehla Lesson- Insaaniyaat”

Woh Padh Raha Tha…

Woh padh raha tha…Jab bhagwa chaddi mainVardi waale ghar main ghuseAur usse goli maardi Wo padh raha tha…Wah kitaabein jo humein saath laayeinshayad yahi unse bardaasht nahi hua Wo padh raha tha…Taaki naam se nahi kaam se jaana jaaye,Wo jo bhi pehne sar uthake chal paaye, Wo padh raha thaTaaki wo sawaal puch sakeUnse joContinue reading “Woh Padh Raha Tha…”

कोई खतरा नहीं- ओमप्रकाश वाल्मीकि

शहर की सड़कों पर दौड़ती-भागती गाड़ियों के शोर में सुनाई नहीं पड़ती सिसकियाँ बोझ से दबे आदमी की जो हर बार फँस जाता है मुखौटों के भ्रमजाल में जानते हुए भी कि उसकी पदचाप रह जाएगी अनचीन्ही नहीं आएगा उसके हिस्से समन्दर की रेत में पड़ा सीपी का मोती लहरें नहीं धोएँगी पाँव हवाएँ भीContinue reading “कोई खतरा नहीं- ओमप्रकाश वाल्मीकि”

ओ नारी—समता की सहपाठी हो तुम!

ओ नारी—समता की सहपाठी हो तुम!अनेक महान सम्बोधन दिये तुम्हें पर दिया नहींतुम्हें निर्णय का अधिकारतुम्हें रिश्ते-नातों श्रृंखला से जकड़ा—शस्त्र और शास्त्र का भय दिखलाकर जो पाँव तुम्हारे साथ चलने की खाते हैं क़समवे ही तुम्हें ठुकरातेजो हाथ तुम्हारा हाथ थामतेवे ही गला दबातेफिर भी ओ नारीअनन्त विसंगतियों-विकृतियों के बीचपत्थर पर उगती—दूब-सी उगती रही हो तुम!Continue reading “ओ नारी—समता की सहपाठी हो तुम!”