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चिड़िया और पेड़

एक बार मैंने अपनी बालकनी से एक पेड़ और चिड़िया की बात सुनी, उसी के कुछ अंश।

पेड़: बात मान मैं बोल रहा हूं ना उड़ जा

चिड़िया: आप ही बताओ कैसे जाऊं, अभी तो बच्चों को ढंग से उड़ना तक नहीं आया है

पेड़: तू बात को समझ नहीं रही है, वो तो लाकडाउन की वजह से मैं अब भी खड़ा हूं

चिड़िया: नहीं तो…

पेड़: नहीं तो यह इंसान मुझे अर्बन डेवलपमेंट के नाम पे काटने का प्लान कर रहे हैं

चिड़िया: हां पर अब तो यह समझ जाएंगे ना यह पृथ्वी हमारी भी है

पेड़: अरे मैं बहुत साल से देख रहा हूं, इनमें से बहुत कम को ही हमारी फ़िक्र है, बाकी सब तो लालची थे और लालची रहेंगे

चिड़िया (चिंतित): तो मतलब मेरा घर भी उजड़ जाएगा

पेड़: इसलिए तो कह रहा हूं उड़ जा…

चिड़िया ने पेड़ की बात मान ली, और अपने बच्चों के साथ उड़ने की प्रैक्टिस शुरू कर दी, मगर जल्दी सीखने के चक्कर में एक बच्चा बिजली के तार में फंस गया और उसके पंख पर चोट लग गई और वो बीच रास्ते में गिर गया। यह तो अच्छा था कि लाकडाउन के कारण रास्तों पर गाड़ी नहीं थी वरना… अब चिड़िया की घबराहट और बढ़ गई। वो जैसे तैसे अपने बच्चे को पेड़ की सबसे नीची  डाली तक ले जा पाई।

तभी एक मजदूर की नजर उस पेड़ पर पड़ी और वह उसके नीचे आराम करने बैठ गया। उसकी हालत बहुत खराब थी, वो कुछ 250 मील की पैदल यात्रा करके यहां तक पहुंचा था और अभी उसे 200 मील और चलना था। उसके बदन पर कुछ लाठियों के निशान थे और उसके बदन से केमिकल की बदबू आ रही थी। बीच रास्ते में भले लोगों ने बिस्किट के पैकेट और पानी की बॉटल भी दी थी, मगर अब उसमें दो बूंद पानी बचा होगा। उसने पेड़ से फल तोड़ने की कोशिश की मगर उसके अंदर इतनी शक्ति नहीं बची थी कि वह फल तोड़ पाए। आखिर में थक हार कर वो बैठ गया और रोने लगा। अपने रोने में उसे किसी और के रोने की भी आवाज़ अायी।

वो उठ खड़ा हुआ और आस पास देखने लगा…

मजदूर: कौन है

पेड़ हिलने लगा और मजदूर डर गया मगर उसने जैसे ही भागने की कोशिश की, वो गिर गया

पेड़: भैया यह चिड़िया रो रही है, में पेड़ बोल रहा हूं

मजदूर (पीछे रेंगते हुए): कौन… कौन है, भूखे के साथ क्यों मज़ाक करते हो।

पेड़: हम क्यों मज़ाक करेंगे, हम खुद ही परेशान हैं

मजदूर: अच्छा तुम पेड़ बोल रहे हो तो फल गिरा कर बताओ

पेड़ और ज़ोर से हिलने लगा और उस पर से एक फल गिरा। मजदूर ने झट से उस फल को उठाया और दो बूंद बचा पानी डाला और उसे खाने लगा।

मजदूर: धन्यवाद पेड़… मगर यह चिड़िया क्यों रोती है, उसे हमारे जैसे चलना कहां है… वो तो जहां चाहे उड़ सकती है, जो चाहे खा सकती है

पेड़: भैया अर्बन डेवलपमेंट का नाम सुना है

मजदूर: अरे नाम मत लो उस राक्षस का, शहर के एक किनारे पर मैं सालों से झोपड़ी में रह रहा था, पर अचानक पहले तो इस लोकडाउन ने काम बंद कराया फिर एक दिन झोपड़ी खाली करने को कह दिया, बोले झोपड़ी तोड़कर, पास के नाले को साफ कर, सुंदर झील बनाएंगे, वो भी लोकडाउन के बीचों बीच।

पेड़: अरे तुमने तो पूरी गाथा ही गढ़ दी, पर बिलकुल यही काम इस चिड़िया के साथ भी होने वाला है

मजदूर: मतलब…

पेड़:इसके घर को भी थोड़े दिन में कुछ लोग बिना बताए उजाड़ने वाले

मजदूर: इसके घर को तो मतलब… तुम्हें… तुम्हें काट रहे हैं

पेड़: और मेरी जगह बिजली का खंबा लगाएंगे…

मजदूर: …

चिड़िया (सांस भरते हुए): और मैंने यहां से जाने की कोशिश की तो मेरा बच्चा ज़ख्मी हो गया

मजदूर फल खाते खाते रुक गया और कुछ सोचने लगा… थोड़ी देर बाद उसने अपने सामान में से एक टोकरी निकाली

मजदूर: एक काम करते हैं, चिड़िया तुम अपने बच्चों को इसमें रख लो।

चिड़िया थोड़ी डर गई

पेड़ (मजदूर से): क्यों भला?

मजदूर: अरे डरो मत! हमारे गांव में बहुत से पेड़ हैं, वहां उसे नया घोंसला बनाने की भरपूर जगह मिलेगी

चिड़िया: और मैं तुम पर विश्वास क्यों करूं

मजदूर: पहली बात तो घर टूटने का दर्द मैं जानता हूं, दूसरी बात पेड़ ने मेरी जान बचाई है, इतना तो मैं कर ही सकता हूं

पेड़ खुशी के मारे ज़ोर से मचलने लगा और उसने आठ- दस फल और गिरा दिए

पेड़: रास्ते के लिए यह रख लो

चिड़िया: पर पेड़ का क्या होगा

पेड़: अरे मेरी फ़िक्र छोड़ अब

मजदूर: ऐसे कैसे छोड़ दें, गांव पहुंचकर सबसे पहले अपने आंगन में तुम्हारे बीज लगाऊंगा और फिर तुम्हारी अच्छे से देख रेख करूंगा

चिड़िया खुश हो गई…उसने पेड़ को अलविदा कहा और उसे शुक्रिया किया

पेड़: भैया सुनो, चिड़िया ना रास्ते भर के पेड़ों को जानती है, जब भी यह फल खत्म हो जाए, दूसरे पेड़ भी तुम्हें खुशी खुशी फल दे देंगे और बीच में अाई नदियों से तुम पानी ले पाओगे।

मजदूर ने पेड़ को सीने से लगाया और उसमें एक नई सी शक्ति आ गई। वह चिड़िया और उसके बच्चों को टोकरी में ध्यान से रखकर गांव की ओर चल दिया ।

सूरज ने यह सब देख, अपना ताप उस दिन के लिए थोड़ा कम कर दिया।
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नोट: अगर आपने यहां तक पढ़ने की हिम्मत करी है तो इस बात को आप मानते होंगे कि प्रकृति से हम हैं, ना की हम से प्रकृति। यह लेख लिखने के दो कारण हैं-  जब हम लोग लॉकडाउन में घर के अंदर हैं, चंद शाक्तिशाली और लालची लोगों ने

1. ‘अमेज़ोन ऑफ द ईस्ट’ कहे जाने वाले देहिंग पतकाई वाइल्ड लाइफ संक्चरी में कोयला खनन की अनुमति देकर, 270000 पेड़ों और असंख्य प्रजातियों के पशु पक्षी को खतरे में डाल दिया है।

2. कुछ दिनों पहले यह घोषणा हुई है कि पश्चिमी घाट पर रेल लाइन बिछाने के लिए 220000 पेड़ों को काटा जाएगा।

अगर हम प्रकृति का ख्याल नहीं रखेंगे तो वो कैसा विनाश कर सकती है, यह आपको ओडिशा और बंगाल की हालत देखकर समझ आ गया होगा। इसलिए हम सब को इसके खिलाफ आवाज़ उठानी होगी। पशु पक्षी, पेड़ और इंसान को साथ आगे बढ़ना है नहीं तो हमारा विनाश बहुत दर्दनाक होगा। ज़्यादा से ज़्यादा पेड़ लगाएं और जहां भी पेड़ कटने की खबर आए उसके खिलाफ आवाज़ उठाएं।

धन्यवाद।

Cover Art: Vaisakh Manoharan

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