सच

सचसच के मायने बदल गए हैंहम बस दो सच ही समझते हैंपहले ही माना हुआ सचदूसरों को झूठलाता सचहमने अपने मन के एक तरफ कालीऔर एक तरफ सफेद स्याही पोत ली हैफिल्म में, टीवी में, इंटरनेट परसब जगह हमअपने माने हुए सच कोऔर सच बनाने केतरीक़े खोज रहे हैंताकि दूसरों की नज़रों मेंजब खुद कोContinue reading “सच”

जुमला और हमला

चुनावी मौसम में नेताजी ने लगाया“बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ”का नाराबेटी पढ़ीआगे बढ़ीउनकी गलतियों के ख़िलाफबेटी की आवाज़ उठीतो जवाब मेंनेताजी बोलेबेटी वो नारा नहीं थाथा एक जुमला…हमसे सवाल करोगीतो हो जाएगातुम्हारी आज़ादी पर हमला On Friday, Natasha Narwal joined the list of students of falsely accused with UAPA for protesting against CAA & NRC andContinue reading “जुमला और हमला”

चिड़िया और पेड़

एक बार मैंने अपनी बालकनी से एक पेड़ और चिड़िया की बात सुनी, उसी के कुछ अंश। पेड़: बात मान…मैं बोल रहा हूं ना,उड़ जा चिड़िया: आप ही बताओ कैसे जाऊं, अभी तो बच्चों को ढंग से उड़ना तक नहीं आया है पेड़: तू बात को समझ नहीं रही है, वो तो लाकडाउन की वजहContinue reading “चिड़िया और पेड़”

यह कैसा समय है? (हिन्दी अनुवाद)

Original – What Kind Of Times Are These? By Adrienne Rich नोट: यह शब्दशः अनुवाद नहीं है, रूह को पकड़ने की कोशिश है । यहां से कुछ दूर पर एक जगह है, जहां दो रास्ते मिलते हैं,एक रास्ते पर दो काफ़ी लंबे पेड़ों के बीच हरी घांस अब भी उग रही हैऔर दूसरे रास्ते परContinue reading “यह कैसा समय है? (हिन्दी अनुवाद)”

स्थिरता और बदलाव

मेरे दादा को बदलाव पसंद नहींउन्होंने शायाद इतने उतार चढ़ाव देखें हैंकी वो हर चीज़ में एक स्थिरता खोजते हैंमेरी मां को स्थिरता से ऊब जाती हैंउन्होंने अपने शुरू के जीवन में ऐसा अभाव देखा हैजिसे बदलाव से ही पूरा किया जा सकता थाइस रोज़मर्रा के द्वंद्व के बीच एक आदमी खड़ा हैजिन्हें मैं पापाContinue reading “स्थिरता और बदलाव”

रोटी, कपड़ा और मकान

सड़क पर निकले तोदवाई छिड़क दी,रेल की खिड़की मेंनंगे बदन से भी पैसा मांग लियाट्रेन शुरू हुई तो बिल्डर्स के साथ मीटिंग करकेमजदूरों को कैद कर लिया गयाउनके जाने पर रोक लगा दीक्या ताकतवर अपनी बची कुची शर्मडोलोगाना कॉफी में मिला कर पी गएउनका क्या कसूर हैयही की वह हमारे घर बनाते हैंहमारे लिए अनाजContinue reading “रोटी, कपड़ा और मकान”

सपनों का किनारा

सपनों के किनारे पे बैठे थे तीन यारएक के लिए बाप दादा का बड़ा जहाज आयाऔर वो विदेश निकल लियादूसरे के लिए एक नाव अाईजिसे उसके मां और पिता नेबड़ी मेहनत से बनाया थादूसरा उसमें बैठा और बड़े शहरनिकल लियातीसरे ने इंतजार कियासोचा कोई तो आएगाकोई आया तो सहीपर उसे धक्का देकर चला गयाथोड़ी देरContinue reading “सपनों का किनारा”

Untied Laces

I close my eyesTo find words for this poemAnd I see a 10-year old kidOf ‘5th E’ eating his tiffinAlone in the classSitting in the library alone,Limping in the corridorsWhen the other kids ranAfter the last school bellI don’t know why is he aloneMaybe that’s how he feltAll his school lifeWhen only the special shoesHeContinue reading “Untied Laces”